एहसास

जुबा से कम ही काम लेता हूँ।                            
नजर आते ही उनको नजरो से बाँध लेता हूँ।


फिर शुरू होती है  
आँखो ही आँखो में                                                                    
अनकही बाते
कुछ कहूँ या कहूँ,
ये सोचकर दिल थाम लेता हूँ।

यु अचानक नजरे झुकाकर 
तोड़ दी बेजुबा बातो की लड़ी।
पलकों को गिराकर 
फिर उठाना 
बिना कुछ कहे
सबकुछ कह जाना।


पलकों को मूँद कर,
अनकहे होठो को विराम देता हूँ।
Shobhna vyas(Soha)

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