BACHPAN मन चंचल और रूप है प्यारा, बचपन का हर अंदाज निराला । मन में छुपी कई शैतानी, बंद मुठी से पकडे पानी । दिल में रखते अरमान कई , आसमान को छुने के। धरती पर तारो को लाके , उनके साथ है खेलने के । ना कोई चिंता ना है फिकर, मन पतंग सा उड़ता बेखबर । कितनी उमंगे कितना है काम, फिर भी हर कोई कहता है नादान। नई सुबह फिर नए है सपने, बचपन का बस यही है काम। SHOBHNA VYAS
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एहसास जुबा से कम ही काम लेता हूँ। नजर आते ही उनको नजरो से बाँध लेता हूँ। फिर शुरू होती है आँखो ही आँखो में अनकही बाते । कुछ कहूँ या न कहूँ , ये सोचकर दिल थाम लेता हूँ। यु अचानक नजरे झुकाकर तोड़ दी बे जुबा बातो की लड़ी। पलकों को गिराकर फिर उठाना बिना कुछ कहे सबकुछ कह जाना। पलकों को मूँद कर , अनकहे होठो को विराम देता हूँ। Shobhna vyas(Soha)
आज के समय में आरक्षण एक ऐसा मुद्दा बन गया है जिसकी चारो और चर्चा है,तो दोस्तों उसी आरक्षण रूपी समस्या को लेकर मेने भी चंद लाइन लिखी है इसी उम्मीद के साथ की शायद आप भी इससे सहमत हों। आरक्षण आरक्षण के कीड़े ने कर दिया है देश को खोखला , पढ़ा लिखा बेकार खड़ा और अनपढ़ करे ढकोसला। सामान्य की श्रेणी में जो भी युवा आए , जी तोड़ करे वो मेहनत और आगे बढ़ना चाहे। ना रहम ना भीख यारो वो किसी से चाहे , फिर भी उसके हिस्से का पद उसको न मिल पाए। में ये नहीं कहता की सामान्य वर्ग को अधिकार मिले , पर जिसकी जैसी योग्यता वैसा उसको अवसर मिले। आरक्षण की बेड़ी को क्यों पैरो में हम डाल चले , जब रहना ही पीछे तो इतना क्यों हम पड़े लिखे । बहुत हो गया आरक्षण का वार अब , देश की प्रगति को कब तक रोकेंगे हम सब। आओ मिल कर खतम करे देश की इस समस्या को अब , हर कंधो पर एक समान हो देश की भागेदारी अब। आरक्षण के कीड़े ने कर दिया है देश को खोखला ...

Nice
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