बात सोच की है

Hello Friends,
                       में सोहा आज आपके लिए कविता नहीं,अपने द्वारा रचित  एक छोटी सी रचना को आप लोगो से बांटना चाहती हु,इसी उम्मीद  के साथ की मेरी कविताओ की तरह मेरी रचना भी आपको  पसंद आये........
बात सोच की है 
एक बार की बात है हम बस स्टॉप पर अपनी बस का इंतजार कर रहे थे वहा एक कार आकर रुकी कार चालक एक महिला थी जो कार से कुछ सामान लेने उतरी थी ,हम ने देखा कार में पीछे की सीट पर एक बुजुर्ग दम्पती  बैठे थे,कुछ देर के बाद हमसे रहा  नहीं गया हमने उनसे बात करना चाही ,हमने नमस्कार किया ,दम्पति ने भी अभिवादान किया ,अच्छे लोग प्रतीत हो रहे थे ,हमारे बीच कुछ क्षण बात हुई,हमने कहा आपने अपनी बेटी को बहुत अच्छी  सिख दी है उसे अपने कार्य के लिए किसी पर भी निर्भर नहीं रहना होगा।महानुभाव ने कहा ये हमारी बेटी नहीं बहु है जनाब ,हम उसे अपनी बेटी के जैसा ही मानते  है।  ये सुन हमारा मन बहुत खुश हुआ महिलाओ को यु बराबरी  मान सम्मान मिलते देख हमें बड़ी खुशी होती है ,और जब महिला एक बहु हो तो और ज्यादा ही। हमारे द्वारा की गई तारीफ़ से  महानुभाव के चेहरे पर भी ख़ुशी थी। 
कुछ क्षण विचार के बाद हमने पूछा क्या आपकी पत्नी या आपको कोई तकलीफ है ,उन्होंने जवाब दिया नहीं ऐसी कोई बात नहीं।  तो हमने कहा फिर आप आगे की सीट पर क्यों नहीं बैठे। दम्पति सोच में पडगये  बुजुर्ग ने कुछ क्षण सोचा और कहा ऐसे ही। 
सो हमने कहा अगर गाडी आपका बेटा या बेटी चला रहे होते क्या तो भी आप पीछे ही बैठते। वो कुछ बोल नहीं पाए उन्होंने बस अपना सर ना में हिलाया। 
मेने बड़ी विनम्रता से कहा महानुभाव आपने अपनी बहु को बेटी तो माना पर अपना नहीं बना पाए। वो दम्पति कुछ सोच में पड़ गये  और में उन्हें नमस्कार कर वहा से आगे बढ़ गया..........
दोस्तों हर इन्सान की अपनी एक सोच होती है हम किसी की सोच नहीं बदल सकते वो उसे खुद ही बदल ना होगी। इस पूरी रचना का उदेश्य बस बात सोच की है। 
लेखक - शोभना व्यास (सोहा)

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

पीहर