BABUL
बाबुल तेरा आँगन छुटा, मुजसे मेरा बचपन रूठा ।
तेरे आँगन में खेली में, तेरी ऊँगली थाम चली में ।
तूने मुझ्को हँसना सिखाया,अच्छे बुरे में फर्क बताया |
तेरे आंगन में नित नए सपने देखे, तेरे कंधो पर बैठ कर देख लिया जहाँ सारा।
तेरा आँगन छुटा तो सपने सारे छुट गए,वो रुठने मनाने के बहाने सारे रूठ गए।
तूने ही तो बतलाया था में फुलवारी तेरे आँगन की,मुजसे ही रौनक है तेर घर आँगन की।
फीर बाबुल क्यों तूने मुझे नए आँगन में भेज दिया,और भीगी पलकों से तुमने मुझ्को बोल दिया।
प्यारी बिटिया रानी मेरी ये अंगना तुज बिन बहुत अधूरा है,पर जिस आँगन में जाये तू वो तेरा अपना है।
अपना सारा बचपन, वो तेरे नादानियां फिर देखने लगेगी तू।
उस आँगन में अपने बच्चों को खेलता देख,फिर बाबुल का वो आँगन याद करने लगेगी तू।
Shobhna
vyas
(सोहा
)
heart touching poem Di��
ReplyDeleteReally words are flowing through heart and expressions at its best..Only pure heart can wright and ur r having one of dem.....Superbb BBB
ReplyDeleteSid
Each and every singal words and line expressed Beautifully...
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